पौड़ी। सांस्कृतिक नगरी पौड़ी में 125 साल से अधिक पुरानी रामलीला की परंपरा एक बार फिर मंच पर जीवंत होने जा रही है। कांडई गांव से शुरू हुई रामकथा की यह यात्रा अब पौड़ी शहर की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। वर्ष 1897 में शुरू हुई इस ऐतिहासिक रामलीला का वर्ष 2025 में125वां मंचन हुआ और अब यह 126वें मंचन की ओर बढ़ रही है।
खास बात यह है, कि यहां रामकथा केवल संवादों और अभिनय तक सीमित नहीं है, बल्कि शास्त्रीय राग -रागिनियों, लोकधुनों और पारसी थिएटर शैली का अनूठा संगम भी देखने को मिलता है। बदलते दौर में मंच की रोशनी से लेकर तकनीक तक बदली, लेकिन रामलीला की सांस्कृतिक आत्मा, आज भी बरकरार है। समय के साथ पौड़ी की रामलीला ने सामाजिक बदलावों को भी अपने भीतर शामिल किया। महिला पात्रों की भूमिकाओं में महिलाओं की भागीदारी इसकी महत्वपूर्ण विशेषताओं में शामिल है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार वर्ष 2002 में अहिल्या की भूमिका से महिला कलाकारों की भागीदारी शुरू हुई, और इसके बाद यह परंपरा लगातार आगे बढ़ी। रामलीला में सिर्फ अभिनय ही नहीं, बल्कि पात्रों के वस्त्र और इस्तेमाल होने वाले शस्त्र भी कहानी को जीवंत बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इस ऐतिहासिक परंपरा से नई पीढ़ी भी लगातार जुड़ रही है।
महज आठ वर्ष की उम्र से रामलीला कमेटी से जुड़े राहुल नेगी ने शुरुआती दौर में वानर और राक्षस पात्रों से अपनी शुरुआत की। अब उन्हें भगवान लक्ष्मण की भूमिका निभाने का अवसर मिला है। उनके लिए यह सिर्फ एक किरदार नहीं, बल्कि थिएटर की दुनिया में सीखने और आगे बढ़ने का अनुभव भी है।
