समूची कायनात को संचालित करती है ‘ब्रह्मज्ञान’ की शक्तिः भारती

देहरादून। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की देहरादून शाखा में परम पूज्य सद्गुरुदेव की असीम अनुकम्पा से एक बार पुनः आध्यात्मिक वातावरण से ओतप्रोत भव्य सत्संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर भक्तिभाव से परिपूर्ण मधुर भजनों की मनोहारी प्रस्तुति के साथ श्रद्धालुओं ने आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति की। कार्यक्रम में संगीतज्ञों द्वारा प्रस्तुत भावपूर्ण भजनों ने उपस्थित संगत को भावविभोर कर दिया और पूरा वातावरण भक्तिरस में डूब गया। सत्संग को संबोधित करते हुए साध्वी विदुषी सुभाषा भारती ने कहा कि सत्संग एक ऐसा पवित्र सरोवर है, जिसमें गोता लगाने मात्र से मानव का आंतरिक कायाकल्प हो जाता है। सत्संग के प्रभाव से मनुष्य की नकारात्मक प्रवृत्तियाँ समाप्त होती हैं और उसका जीवन पूर्ण रूप से सकारात्मक दिशा में परिवर्तित हो जाता है। सत्संग मानव को भीतर से शुद्ध कर उसे ईश्वरीय गुणों का अधिकारी बनाता है, जिससे उसका बाह्य जीवन भी स्वतः श्रेष्ठ होने लगता है।

साध्वी सुभाषा भारती ने कहा कि जब मनुष्य ईश्वर के द्वार पर सच्चे भाव से पहुँचता है, तो ईश्वर अपने भक्तों पर अवश्य कृपा करते हैं। किंतु मनुष्य को यह समझना आवश्यक है कि वास्तव में ईश्वर से क्या माँगा जाए। जब साधक परमात्मा से केवल परमात्मा को ही माँगता है, तब ईश्वर उसे पूर्ण गुरु के सान्निध्य तक पहुँचा देते हैं, क्योंकि ईश्वर की प्राप्ति सदैव गुरु के माध्यम से ही होती है। पूर्ण गुरु द्वारा प्रदत्त सनातन ‘ब्रह्मज्ञान’ तकनीक के माध्यम से साधक अपने शरीर रूपी मंदिर में ही ईश्वर तत्व का साक्षात्कार कर पाता है और यहीं से उसकी शाश्वत भक्ति का शुभारंभ होता है, जो अंततः उसे परम लक्ष्य-ईश्वर प्राप्ति-तक ले जाती है।

इस अवसर पर कार्यक्रम की प्रचारिका एवं साध्वी विदुषी अनीता भारती जी ने भक्तजनों को संबोधित करते हुए गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि शिष्य को अपने जीवन में सदैव गुरु का चिंतन करते हुए पूर्ण रूप से उन पर निर्भर रहना चाहिए। जब शिष्य का समर्पण पूर्ण हो जाता है, तब गुरु और शिष्य के बीच की दूरी मानसिक स्तर पर समाप्त हो जाती है और दोनों एकाकार हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में शिष्य दूर रहते हुए भी गुरु की भावना को सहज ही समझने लगता है और महानता के पथ पर अग्रसर होता है।

साध्वी अनीता भारती जी ने कहा कि पूर्ण गुरु सर्वसमर्थ एवं सर्वज्ञ सत्ता होते हैं। उनका प्रत्येक कार्य अपने शिष्य के कल्याण हेतु ही होता है। गुरु अपने शिष्य को परिष्कृत करते हुए उसे अपने समान बनाने की दिशा में अग्रसर करते हैं। उन्होंने विभिन्न शास्त्रीय उदाहरणों के माध्यम से गुरु की सर्वव्यापकता और महत्ता को रेखांकित किया। साध्वी जी ने यह भी कहा कि कभी-कभी गुरु शिष्य के प्रति कठोर भी प्रतीत होते हैं, किंतु यह कठोरता केवल शिष्य के भीतर सुधार और उत्थान की भावना से ही प्रेरित होती है। कार्यक्रम के अंत में प्रसाद का वितरण कर साप्ताहिक कार्यक्रम को विराम दिया गया।

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