जो निरंतर चलता है, एक दिन मंजिल कदमों में होतीः साध्वी जाह्नवी भारती

देहरादून। सद्गुरुदेव आशुतोष महाराज की कृपा से दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान, देहरादून की निरंजनपुर शाखा में साप्ताहिक रविवारीय सत्संग, प्रवचन तथा मधुर भजन-कीर्तन का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत संगीतज्ञों द्वारा प्रस्तुत सुन्दर भजनों और संर्कीतन से हुई, जिनकी प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक रंग से भर दिया। कार्यक्रम का संचालन संस्थान की प्रचारिका साध्वी विदुषी अनीता भारती जी ने किया। अपने प्रवचन में उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन में रिश्ते, मान-सम्मान और धन-वैभव महत्वपूर्ण अवश्य हैं, परंतु सबसे दुर्लभ और अनमोल सौभाग्य दिव्य सत्संग की प्राप्ति है, जो बिना परमात्मा की विशेष कृपा के संभव नहीं होता। उन्होंने समझाया कि मनुष्य संसार के आकर्षणों में उलझकर ईश्वर से दूर हो जाता है, जबकि जीवन का वास्तविक उद्देश्य प्रभु की ओर उन्मुख होना है।

साध्वी जी ने कमल के पुष्प का उदाहरण देते हुए कहा कि कमल भले ही कीचड़ में खिलता है, परंतु उस पर कीचड़ का एक छींटा तक नहीं टिक पाता और उसका लगाव सूर्य से रहता है। उसी प्रकार मनुष्य को संसार में रहते हुए भी अपना संबंध ईश्वर से बनाए रखना चाहिए। यही भाव मनुष्य को भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ाता है और जीवन का परम लक्ष्य सहज रूप से प्राप्त होता है।
इसके बाद साध्वी जाह्नवी भारती जी ने प्रवचन देते हुए कहा कि मनुष्य को भक्ति मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए। जैसे नदी बिना रुके सागर की ओर प्रवाहित होती है और अंत में सागर में विलीन होकर उसी का रूप बन जाती है, उसी प्रकार निरंतर भक्ति में रत साधक अंततः परमात्मा की प्राप्ति कर लेता है।

कार्यक्रम में संस्थान की देहरादून संयोजिका साध्वी विदुषी अरूणिमा भारती ने गुरू की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब शिष्य स्वयं को गुरु के हाथों में समर्पित कर देता है, तब गुरु उसे सबसे श्रेष्ठ रूप में ढालते हैं। जैसे कुम्हार मिट्टी को तोड़कर सुराही का रूप देता है जो स्वयं ठंडी रहती है और दूसरों की प्यास बुझाती है, वैसे ही गुरु साधक को जगत हितकारी बना देते हैं। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति के भीतर ईश्वर की तलाश की सच्ची प्यास होती है, वह अवश्य ही सत्गुरु के दरबार तक पहुँचता है। साध्वी जी ने कहा कि साधक की दृष्टि अपने गुरु पर स्थिर रहनी चाहिए, तभी वह मंजिल तक पहुँच सकता है। जो लोग सत्गुरु के पावन दरबार से जुड़ पाते हैं, वे वास्तव में सौभाग्यशाली होते हैं क्योंकि वहीं से आध्यात्मिक जीवन का वास्तविक प्रारम्भ होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *